(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.319. अध्यायः 319
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
याज्ञवल्क्येन जनकंप्रति सात्विकादिसारतम्यनिरूपणम्॥ 1॥ जनकेन याज्ञवल्क्यंप्रति तत्वकथनप्रार्थना च॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

याज्ञवल्क्य उवाच। 12-319-0x(6510)(78299)
एते प्रधानस्य गुणास्त्रयः पुरुषसत्तम।
कृत्स्नस्य चैव जगतस्तिष्ठन्त्यनपगाः सदा॥ 12-319-1(78300)
अव्यक्तरूपो भगवाञ्शतधा च सहस्रधा।
शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा॥ 12-319-2(78301)
कोटिशश्च करोत्येव प्रकृत्याऽऽत्मानमात्मना।
सात्विकरणोत्तमं स्थानं राजसस्येह मध्यमम्॥ 12-319-3(78302)
तामसस्वाधमं स्थानं प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः।
केवलेनेह पुण्येन भतिभूर्ध्वामवाप्नुयात्॥ 12-319-4(78303)
पुण्यपापेन मानुष्यमधर्मेणाप्यघोगतिम्।
द्वन्द्वनेषां त्रयाणां तु सन्निपातं च तत्वतः॥ 12-319-5(78304)
सत्वस्य रजसश्चैव तमसश्च शृणुष्व मे।
सत्वस्य तु रजो दृष्टं रजसश्च तमस्तथा॥ 12-319-6(78305)
तमसश्च तथा सत्वं सत्वस्याव्यक्तमेव च।
अध्यक्तः सत्वसंयुक्तो देवलोकमयाप्नुयात्॥ 12-319-7(78306)
रवासत्वसमायुक्तो मानुषेषु प्रपद्यते।
रसस्तमोभ्यां संयुक्तस्तिर्यग्योनिषु जायते॥ 12-319-8(78307)
राजसैस्तामसैः सत्वैर्युक्तो मानुषमाप्नुयात्।
पुण्यपापवियुक्तानां स्थानमाहुर्महात्मनाम्॥ 12-319-9(78308)
शाश्वतं चाव्ययं चैवमक्षयं चामृतं च तत्।
ज्ञानिनां संभवं श्रेष्ठं स्थानमव्रणमच्युतम्।
अतीन्द्रियमबीजं च जन्ममृत्युतमोनुदम्॥ 12-319-10(78309)
अव्यक्तस्थं परं यत्तत्पृष्टस्तेऽहं नराधिप।
स एव प्रकृतिस्थो हि तत्स्थ इत्यभिधीयते॥ 12-319-11(78310)
अचेतना चैव मता प्रकृतिश्चापि पार्थिव।
एतेनाधिष्ठिता चैव सृजते संहरत्यपि॥ 12-319-12(78311)
जनक उवाच। 12-319-13x(6511)
अनादिनिधनावेतावुभावेव महामते।
अमूर्तिमन्तावचलावप्रकम्प्यगुणागुणौ॥ 12-319-13(78312)
अग्राह्यावृषिशार्दूल कथमेको ह्यचेतनः।
चेतनावांस्तथा चैकः क्षेत्रज्ञ इति भाषितः॥ 12-319-14(78313)
त्वं हि विप्रेन्द्र कार्त्स्न्येन र्मोक्षधर्ममुपाससे।
साकल्पं मोक्षधर्मस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ 12-319-15(78314)
निस्तत्वं केवलत्वं च विनाभावं तथैव च।
दैवतानि च मे ब्रूहि देहं यान्याश्रितानि वै॥ 12-319-16(78315)
तथैवोत्क्राणिणः स्थानं देहिनो वै विपद्यतः।
कालेन यद्धि प्राप्नोति स्थानं तत्प्रब्रवीहि मे॥ 12-319-17(78316)
साङ्ख्यज्ञानं च तत्त्वेन पृथग्योगं तथैव च।
अरिष्टानि च तत्त्वानि वक्तुमर्हसि सत्तम।
विदितं सर्वमेतत्ते पाणावामलकं यथा॥ ॥ 12-319-18(78317)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 319॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-319-12 सच्चेतनश्चैप मतः प्रकृतिस्थश्च पार्थिवेति ट. ड. पाठः॥ 12-319-13 अप्रकम्प्यौ त्रणाव्रणाविति ट. ड. पाठः। अप्रकम्प्यौ वृषावृषाविति थ. पाठः॥ 12-319-16 अस्तित्वं केव त्वं चेति झ. पाठः॥ 12-319-17 देहिनोऽपि वियुज्यत इति ट. पाठः॥ 12-319-18 अनुक्तानि च तत्वेनेति ट. पाठः॥


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